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नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी ने प्री-पीएचडी कोर्स वर्क के अंतर्गत शोधार्थियों को दो महत्वपूर्ण व्याख्यान दिए। इस दौरान उन्होंने “शोध में कंप्यूटर का उपयोग” तथा “बौद्धिक संपदा अधिकार” जैसे समकालीन और शोध कार्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से जानकारी दी।

पहले व्याख्यान में प्रो. ललित तिवारी ने यूज ऑफ कंप्यूटर इन रिसर्च विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि वर्तमान समय में कंप्यूटर शोध कार्य का एक अनिवार्य और अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। उन्होंने बताया कि कंप्यूटर वर्तमान में अपनी पांचवीं पीढ़ी में पहुंच चुका है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में नई संभावनाएं उपलब्ध करा रहा है।

प्रो. तिवारी ने कहा कि शोध कार्य के दौरान कंप्यूटर की भूमिका केवल दस्तावेज तैयार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जटिल समस्याओं के समाधान, विषय से संबंधित साहित्य एवं शोध सामग्री खोजने, आंकड़ों के संकलन, गणना, विश्लेषण और व्याख्या में भी महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करता है। कंप्यूटर के माध्यम से शोधार्थी बड़े स्तर के डाटा को व्यवस्थित कर उसकी सटीक गणना और वैज्ञानिक व्याख्या कर सकते हैं।

उन्होंने शोधार्थियों को यह भी समझाया कि कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक का उपयोग करते समय यथार्थता और एक्यूरेसी का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। तकनीक शोध कार्य को सरल और तेज बनाती है, लेकिन प्राप्त परिणामों की सत्यता और वैज्ञानिक प्रमाणिकता की जिम्मेदारी शोधकर्ता की होती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैज्ञानिक और शैक्षणिक दौर में कंप्यूटर के प्रभावी उपयोग के बिना गुणवत्तापूर्ण शोध कार्य की कल्पना करना कठिन है।

दूसरे व्याख्यान में प्रो. ललित तिवारी ने बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) विषय पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मनुष्य का मस्तिष्क अत्यंत अद्भुत और रचनात्मक है। मानव मस्तिष्क से उत्पन्न नए विचार, आविष्कार और समस्याओं के समाधान की दिशा में विकसित की गई नवीन सोच समाज और विकास के लिए महत्वपूर्ण होती है।

उन्होंने बताया कि मानव मस्तिष्क से उत्पन्न ऐसी नवीन रचनाओं और विचारों को ही बौद्धिक संपदा के रूप में देखा जाता है। इन रचनाओं, आविष्कारों और नवाचारों पर संबंधित व्यक्ति के अधिकारों को सुरक्षित करने का कार्य बौद्धिक संपदा अधिकारों के माध्यम से किया जाता है। यह व्यवस्था नवाचार करने वाले व्यक्ति के आर्थिक और कानूनी अधिकारों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रो. तिवारी ने बताया कि बौद्धिक संपदा अधिकारों के विभिन्न प्रकार हैं, जिनमें कॉपीराइट, डिजाइन, पेटेंट और ज्योग्राफिकल इंडिकेशन प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक शोधार्थी को बौद्धिक संपदा अधिकारों की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि शोध के दौरान विकसित होने वाले नए विचारों, तकनीकों और आविष्कारों को उचित कानूनी संरक्षण मिल सके।

उन्होंने शोधार्थियों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए नवाचार, मौलिकता और शोध की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने का आह्वान किया।

इस अवसर पर विज्ञान वर्ग के शोधार्थी भावना, पूजा, प्रकाश पालीवाल, नितेश और चित्रलेखा सहित कोर्स कोऑर्डिनेटर प्रो. सुषमा टम्टा तथा डॉ. नीलू लोधियाल उपस्थित रहे।

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